पहले अलग देश अब अलग राज्य बाद मे अलग जिला और उसके भी बाद मे अलग तहसील.शायद यही कहानी हमारे भारत की दिख रही है.भारत सरकार के जल्दबाजी मे लिए गए फैसले का परिणाम हमे भुगतना पढ़ रहा है या हो सकता है आगे भी भुगतना पड़ेगा.सभी दल जो राज्य की मांग कर रहे है वो अपनी अलग भूमि चाहते है या उनमे से कुछ है जो ये कह रहे है की बड़े राज्य की अपेक्षा छोटे राज्य ज्यादा तेज़ी से विकास करेंगे.इस कथन का जीता जागता उदाहरण है झारखण्ड, जहा कोड़ा के कारनामे बने और वो बहार आये.विकास की यदि बात करे तो छत्तीसगढ़ से अच्छा कोई उदाहरण नहीं है,सर्वाधिक नक्सल प्रभावित राज्य है,३ रूपये किलो चावल से मजदूर वर्ग मे निकम्मापन व कामचोरी मे बेतहाशा वृद्धि हुई है.
केंद्र सरकार द्वारा रात को लिया गया फैसला हमे और अन्धकार मे भेजते जा रहा है कई और राजनितिक पार्टिया अपनी मांग को लेकर भूख हड़ताल मे बैठने वाली है सभी को अपनी ज़मीं और अपना आसमान चाहिए वो ये नहीं सोचते की इससे कितना नुक्सान हो सकता है.कोई भी ये नहीं सोचता की हमारे देश का क्या होगा सब अपनी अपनी राजनितिक रोटिया सेक रहे है और आग हमारे दिलो पर लग रही है .रातो रात कोई फैसला नहीं होता यदि भूख हड़ताल ओदनी ही थी तो आश्वासन भी दिया जा सकता है जब जनता को हज़ारो आश्वासन देने के बाद भूल जाते है तो एक और सही थोड़े दिनों बाद यह सब ठंडा हो जाता और अगले लो.स, चुनाव के समय फिर भूसे मे चिंगारी फेक देते.छोटे राज्य कहने से ही मुझे वहा की पार्टियों की कुर्सी के प्रति आस्था नज़र आती है.कोई भी पार्टी अपने भाषण की शुरुआत विकास के लिए छोटा राज्य से नहीं करती.
सिर्फ छोटा राज्य होने से ही विकास नहीं होता वहा पर खुद के बल मे राज्य चलने की सम्भावना भी रहनी चाहिए.एक आग को लगाकर हमारी सरकार ने पूरा घर जलाने का काम किया है अब यह देखना रोचक होगा की उस आग मे कौन कौन बचता है और कौन जलता है
जय हिंद.....
nice
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