कल का दिन काला दिवस था इस दिवस को ''कवर'' करने के लिए भारत भर के समाचार चेनलो में युद्ध चिद गया था हमारी संवेदना दुसरे चेनलो से ज्यादा है ऐसादिखने मै कोई कोर कसार नहीं छोड़ी जैसे की मैंने पहले लिखा था की वायलिन की डरावनी आवाजों के साथ २१इन्च के टीवी पर बमुश्किल १०इन्च में कुछ देखते है उसमे भी उन १०इंच में कुछ न कुछ लिखा होता है पर हुआ इसका एकदम उलट इन्होने ने तो वायलिन की नर्म आवाजों के साथ लोगो को रोते हुए दिखाया और इनके साथ साथ उन लोगो की भावनाओ को भी रुलाया जो इन्हें देख रहे थे मैंने तो एस एम् एस के ज़रिये लोगो तक एक सन्देश प्रचारित कर दिया था की ऐसे किसी भी ''रिपोर्ट'' को न देखे ये सिर्फ भावनाओ के साथ खेलकर पैसा कमाना चाहते है अब जो मेरे दोस्तों ने किया वो मेरे दोस्त ही जाने.पर एक बाट की तसल्ली हो गयी की कम से कम समाचार चेनलो को ये तो समझ आया की लोग वायलिन कीडरावनी आवाज़ नहीं बल्कि नर्म आवाज़ लोग सुनना चाहते है.मुंबई हमलो को मीडिया कितने दिन याद रखता है या याद रखने देता है ये तो मीडिया ही जाने ज्यादा से ज्यादा ५ साल उसके बाद धीरे धीरे ये लोग इन हमलो के बारे में बताना कम कर देंगे और १० साल होते तक ये तो बंद ही हो जायेगा इसका एक जीता जागता उदाहरण है ९३ मुंबई धमाका.
कल का दिन तो सभी के लिए ''कुबेर के खजाने में नहाने'' का दिन था सभी समाचार चेनलो व् मोबाइल कम्पनियों ने जी भरकर पैसे कमाए होंगे लोगो की संवेदनाओ के साथ खेलकर धन कमाने का नया ''आईडिया'' है ये .में भी इसमें फस गया औए मैंने भी अपने दो दोस्तों को एस एम् एस कर दिया एक तो मेरे ही मोबाइल पर आया था और उसे मैंने ओने दोस्त को फोरवर्ड कर दिया तब मुझे समझ में आया की ये तो पूरा खेल है .पर मुझे लगता है की एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब हमारी मीडिया भी समझदार हो जाएगी और हम भी न्यूज़ देखेंगे न की बकवास.
जय हिंद....
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